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Wednesday, November 19, 2014

प्रेम की संकरी गली।



गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!
एक थी मन की कसक,
जो साधनाओं में ढली, कल्पनाओं में पली;
और अब तो प्राण मेरे कुछ ठगे-से रह गए!
पंथ था मुझको अपरिचित, मैं नहीं अब तक चली
प्रेम की संकरी गली।

बढ़ गए पग, किंतु सहसा
और मन भी बढ़ गया
लोक-लीकों के सभी भ्रम, एक पल में ढह गए
गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए
वह मधुर वेला प्रतीक्षा की मधुर अनुहार थी
मैं चकित साभार थी;
कह नहीं सकती हृदय की जीत थी, या हार थी
वेदना सुकुमार थी
पंथ था मुझको अपरिचित, मैं नहीं अब तक चली
प्रेम की संकरी गली।

मौन तो वाणी रही, पर
भेद मन का खुल गया
जो न कहना चाहती थी, ये नयन सब कह गए!
गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!
कल्पना जिसकी संजोई सामने ही पा गई
वह घड़ी भी आ गई
छवि अनोखी थी हृदय पर छा गई
सहज ही मन भा गई, देखते शरमा गई;
कर सकी मनुहार भी कब,
मैं स्वयं में खो गई
पंथ था मुझको अपरिचित, मैं नहीं अब तक चली
प्रेम की संकरी गली।

~ गोरख नाथ

  August 13, 2014

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