
दुनिया मेरी नज़र से तुझे देखती रही
फिर मेरे देखने में बता क्या कमी रही
क्या ग़म अगर क़रार ओ सुकूँ की कमी रही
ख़ुश हूँ कि कामयाब मेरी ज़िन्दगी रही
इक दर्द था जिगर में जो उठता रहा मुदाम
इक आग थी कि दिल में बराबर लगी रही
मुदाम=हमेशा
दामन दरीदा लब पे फुगाँ आँख खूँचकाँ
गिरकर तेरी नज़र से मेरी बेकसी रही
दामन= आंचल, दरीदा=हिस्सों में बटा हुआ, लब पे फुगाँ=होठों पर दर्द की पुकार, खूँचकाँ=जिससे खून टपक रहा हो, बेकसी=मजबूरी
आई बहार जाम चले मय लुटी मगर
जो तिशनगी थी मुझको वही तिशनगी रही
तिशनगी=प्यास
खोई हुई थी तेरी तजल्ली में कायनात
फ़िर भी मेरी निग़ाह तुझे ढूँढती रही
तजल्ली=रौनक, कायनात=सृष्टि
जलती रहीं उम्मीद की शम्में तमाम रात
मायूस दिल में कुछ तो ज़िया रोशनी रही
~ मेहर लाल ज़िया फतेहाबादी
Dec 26, 2012| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
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