
जय तुम्हारी देख भी ली
रूप की गुण की रसीली ।
वृद्ध हूँ मैं वृद्ध की क्या
साधना की सिद्धी की क्या
खिल चुका है फूल मेरा
पंखड़ियाँ हो चलीं ढीली ।
चढ़ी थी जो आँख मेरी
बज रही थी जहाँ भेरी
वहाँ सिकुड़न पड़ चुकी है ।
जीर्ण है वह आज तीली ।
आग सारी फुक चुकी है
रागिनी वह रुक चुकी है
स्मरण में आज जीवन
मृत्यु की है रेख नीली ।
~ सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
Jan 24, 2013| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
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