
नज़म उलझी हुई है सीने में
मिस्रें अटके हुए हैं होंठों पर
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ्ज़ कागज़ पे बैठे ही नहीं
कब से बैठा हूँ मैं जानम
सादे कागज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़म क्या होगी
~ गुलज़ार
Jan 14, 2013| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
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