
डरते-डरते दमे-सहर (सुबह) से,
तारे कहने लगे क़मर (चाँद) से ।
नज़्ज़ारे रहे वही फ़लक पर,
हम थक भी गये चमक-चमक कर ।
काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना,
चलन, चलना, मुदाम (लगातार) चलना ।
बेताब है इस जहां की हर शै,
कहते हैं जिसे सकूं, नहीं है ।
होगा कभी ख़त्म यह सफ़र क्या ?
मंज़िल कभी आयेगी नज़र क्या ?
कहने लगा चाँद, हमनशीनो !
ऐ मज़रअ-ए-शब के खोशाचीनो !
(रात की खेती की बालियाँ चुनने वालों)
जुंबिश (हिलने) से है ज़िन्दगी जहां की,
यह रस्म क़दीम (पुरानी) है यहाँ की ।
इस रह में मुक़ाम बेमहल ((कुसमय) है,
पोशीदा (छिपा हुआ) क़रार (ठहराव) में अज़ल (मृत्यु) है ।
चलने वाले निकल गये हैं,
जो ठहरे ज़रा, कुचल गये हैं ॥
~ इक़बाल
Sept 19, 2013
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