
मेरे पहलू में जो बह निकले तुम्हारे आंसू,
बन गए शामे-मोहब्बत के सितारे आंसू |
देख सकता है भला कौन ये प्यारे आंसू,
मेरी आँखों में न आ जाए तुम्हारे आंसू |
अपना मुह मेरे गिरेबां में छुपाती क्यों हो,
दिल की धडकन कही सुन ले न तुम्हारे आंसू |
साफ़ इकरारे-मोहब्बत हो जबां से क्यो कर,
आँख में आ गए यू शर्म के मारे आंसू |
हिज्र अभी दूर है, मै पास हूँ, ऐ जाने-वफ़ा,
क्यों हुए जाते है बैचेन तुम्हारे आंसू |
*हिज्र=जुदाई
सुबह-दम देख न ले कोई ये भीगा आँचल,
मेरी चुगली कही खा दें न तुम्हारे आंसू |
*सुबह-दम=सुबह के वक्त
दमे-रुख़सत है क़रीब, ऐ ग़मे-फ़ुर्कत खुश हो,
करने वाले है जुदाई के इशारे आंसू |
*दमे-रुख्सत=विदाई का समय; गमे-फुरकत=जुदाई का गम
सदके उस जाने-मोहब्बत के मैं ‘अख्तर’ जिसके,
रात-भर बहते रहे शौक़ के मारे आंसू
~ अख्तर शिरानी
August 22, 2013
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