वो शामे-वस्ल दुश्मन ज़ुल्फ सुलझाते हैं रुक-रुक कर
उन्हें याद आ गईं क्या, गुत्थियाँ मेरे मुक़द्दर की ?
*शामे-वस्ल=मिलन की रात; मुक़द्दर=भाग्य
~ 'फ़ानी'
Oct. 9, 2013 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
उन्हें याद आ गईं क्या, गुत्थियाँ मेरे मुक़द्दर की ?
*शामे-वस्ल=मिलन की रात; मुक़द्दर=भाग्य
~ 'फ़ानी'
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