इसी सबब से हैं शायद, अज़ाब जितने हैं
झटक के फेंक दो पलकों पे ख्वाब जितने हैं
वतन से इश्क़, गरीबी से बैर, अमन से प्यार
सभी ने ओढ़ रखे हैं, नक़ाब जितने हैं
समझ सके तो समझ ज़िन्दगी की उलझन को
सवाल उतने नहीं हैं, जवाब जितने हैं ।
~ जाँ निसार अख़्तर
Sept 3, 2013 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
झटक के फेंक दो पलकों पे ख्वाब जितने हैं
वतन से इश्क़, गरीबी से बैर, अमन से प्यार
सभी ने ओढ़ रखे हैं, नक़ाब जितने हैं
समझ सके तो समझ ज़िन्दगी की उलझन को
सवाल उतने नहीं हैं, जवाब जितने हैं ।
~ जाँ निसार अख़्तर
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