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Sunday, November 23, 2014

कतरा के ज़िन्दगी से गुज़र जाऊं



कतरा के ज़िन्दगी से गुज़र जाऊं क्या करूँ
रुसवाइयों के खौफ़ से मर जाऊं क्या करूँ

मैं क्या करूँ के तेरी अना को सुकूँ मिले
गिर जाऊं, टूट जाऊं, बिखर जाऊं क्या करूँ

फिर आके लग रहे हैं परों पर हवा के तीर
परवाज़ अपनी रोक लूं डर जाऊं क्या करूँ

~ नुसरत मेहदी

   Sept 17, 2013

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