
कतरा के ज़िन्दगी से गुज़र जाऊं क्या करूँ
रुसवाइयों के खौफ़ से मर जाऊं क्या करूँ
मैं क्या करूँ के तेरी अना को सुकूँ मिले
गिर जाऊं, टूट जाऊं, बिखर जाऊं क्या करूँ
फिर आके लग रहे हैं परों पर हवा के तीर
परवाज़ अपनी रोक लूं डर जाऊं क्या करूँ
~ नुसरत मेहदी
Sept 17, 2013
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