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Monday, November 24, 2014

शाम है, मैं उदास हूँ शायद





शाम है, मैं उदास हूँ शायद
अजनबी लोग अभी कुछ आयें
देखिए अनछुए हुए सम्पुट
कौन मोती सहेजकर लायें
कौन जाने कि लौटती बेला
कौन-से तार कहाँ छू जायें!

बात कुछ और छेड़िए तब तक
हो दवा ताकि बेकली की भी,
द्वार कुछ बन्द, कुछ खुला रखिए
ताकि आहट मिले गली की भी -

देखिए आज कौन आता है -
कौन-सी बात नयी कह जाये,
या कि बाहर से लौट जाता है
देहरी पर निशान रह जाये,
देखिए ये लहर डुबोये, या
सिर्फ़ तटरेख छू के बह जाये,

कूल पर कुछ प्रवाल छूट जायें
या लहर सिर्फ़ फेनावली हो
अधखिले फूल-सी विनत अंजुली
कौन जाने कि सिर्फ़ खाली हो?

~ धर्मवीर भारती

   August 25, 2013

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