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Monday, November 24, 2014

हम के ठहरे अजनबी



हम के ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद
*मुदारातों=तकल्लुफ

कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
*सब्जे=बाग

थे बहुत बे-दर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क के
थीं बहुत बे-महर सुबहें महरबां रातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते, मुनाजातों के बाद
*मुनाजातों=इबादत

उनसे कहने जो गए थे फैज़ जां-सदका किये
अनकही ही रह गयी वो बात सब बातों के बाद
*जां-सदका=ज़िंदगी के लिए

~ फैज़ अहमद फैज़


   August 28, 2013

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