उस फ़ितनाए-शबाब का आलम न पूछिए
इक हश्र उठ रहा है तमाशा लिए हुये ।
*फ़ितनाए-शबाब=यौवन रूपी उपद्रव; आलम=हालत; हश्र=प्रलय
~ हफ़ीज़ 'जालंधरी'
Oct. 18, 2013 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
इक हश्र उठ रहा है तमाशा लिए हुये ।
*फ़ितनाए-शबाब=यौवन रूपी उपद्रव; आलम=हालत; हश्र=प्रलय
~ हफ़ीज़ 'जालंधरी'
Oct. 18, 2013 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
No comments:
Post a Comment