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Sunday, November 23, 2014

कही सुनी पे बोहत एतबार



कही सुनी पे बोहत एतबार करने लगे
मेरे ही लोग मुझे संगसार* करने लगे
*संगसार=पत्थर मारना

पुराने लोगों के दिल भी हैं खुशबुओं की तरह
ज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे

नए ज़माने से आँखें नहीं मिला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से प्यार करने लगे

कोई इशारा, दिलासा न कोई वादा मगर
जब आई शाम तेरा इंतज़ार करने लगे

हमारी सादा-मिजाजी कि दाद दे कि तुझे
बगैर परखे तेरा एतबार करने लगे

~ वसीम बरेलवी

   Sept 24, 2013

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