
सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को
पहले तो लगा कि अब आयीं तुम, आकर
अब हँसी की लहरें काँपी दीवारों पर
खिड़कियाँ खुलीं अब लिए किसी आनन को
पर कोई आया गया, न कोई बोला
ख़ुद मैंने ही घर का दरवाज़ा खोला
आदतवश आवाज़ें दी सूनेपन को
फिर घर की खामोशी भर आई मन में
चूड़ियाँ खनकतीं नहीं कहीं आँगन में
उच्छ्वास छोड़कर ताका शून्य गगन को
पूरा घर अँधियारा गुमसुम साये हैं
कमरे के कोने पास खिसक आए हैं
सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को
~ दुष्यंत कुमार ('आवाज़ों के घेरे' संकलन से)
August 19, 2013
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