बला से वो दुश्मन हुआ है किसी का
वो काफिर सनम, क्या खुदा है किसी का !
किसी की तपिश में ख़ुशी है किसी की
किसी की खलिश में मजा है किसी का !
जरा डाल दो अपनी जुल्फों का साया
मुकद्दर बहुत नारसा है किसी का !
मेरी बज्म में आ के वो पूछते है
बुरा हाल हम ने सुना है किसी का !
मेरी इल्तिजा पर बिगड़ कर वो बोले
नही मानते, इसमें क्या है किसी का !
बजाहिर न जाने, या जाने, न जाने
तुझे 'दाग़' दिल जानता है किसी का !
~ दाग़ देहलवी
Sept 7, 2013
No comments:
Post a Comment