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Monday, November 24, 2014

गंध की पंखुरियों पर



गंध की पंखुरियों पर
बूँदों का पहरा
अंतर का तरलायित दर्द
बिखर
ठहरा।
झिलमिल-सी ज़िंदगी है ये ठहरा जल
सत्य के झरोखों से
झाँक रहा छल।

इंद्रधनुष-सा भविष्य
दे दिया जनम ने।
आलस के बीच-मंत्र
सिद्ध किए
हमने।
शेखियाँ बघारते गई उमर निकल,
ललक रहे बोये बिन
काटने फसल।

चटख-चटख रंगों में
ज़िंदगी नई।
मुट्ठी भर रोशनी
सही नहीं गई,
लंगड़ाती ताबों का अगुआ
हर दल।
आस के धुँधलकों की
धारा अविरल।

मुट्ठियाँ हवाओं में
तान-तान सोचा
हाय कुछ न आया
तो खालीपन नोचा।
सिसिफस का शाप जिया करते
हर पल!
इसी तरह मुरझ गए
शतदली कमल!

*सिसिफस=

यूनानी कथाओं में सिसीफस को यह सजा दी गई कि वह पत्थर को लुढ़काते हुये पहाड़ के शिखर तक ले जाये और दूसरी ओर लुढ़का दे. पर जैसे ही वह पत्थर शिखर के नज़दीक तक ले आता है, पत्थर लुढ़क कर फिर नीचे आ जाता है. सिसीफस बार बार अपनी कोशिश में असफल होता है. तब से ले कर आज तक, यह क्रम तब तक अनवरत चलता रहेगा जब तक सिसीफस ऊपर की ओर लुढ़काते हुए इस भारी पत्थर को पर्वत शिखर तक ले जाने में कामयाब न हो जाये. 

~ कन्हैयालाल नंदन

   August 8, 2013

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