
सूखे विटप की सारिके!
उजड़ी-कटीली डार से
मैं देखता किस प्यार से
पहना नवल पुष्पाभरण
तृण, तरु, लता, वनराजि को
हैं जो रहे विहसित वदन
ऋतुराज मेरे द्वार से।
*विटप=लता; सारिका=मैना; पुष्पाभरण=पुष्प आभूषण;
वनराजि=वन की सुंदरता बढ़ाना; विहसित वदन=हंसी के शब्द
मुझ में जलन है प्यास है,
रस का नहीं आभास है,
यह देख हँसती वल्लरी
हँसता निखिल आकाश है।
जग तो समझता है यही,
पाषाण में कुछ रस नहीं,
पर, गिरि-हृदय में क्या न
व्याकुल निर्झरों का वास है ?
* वल्लरी=मंजरी, लता
बाकी अभी रसनाद हो,
पिछली कथा कुछ याद हो,
तो कूक पंचम तान में,
संजीवनी भर गान में,
सूखे विटप की डार को
कर दे हरी करुणामयी
पढ़ दे ऋचा पीयूष की,
उग जाय फिर कोंपल नयी;
जीवन-गगन के दाह में
उड़ चल सजल नीहारिके।
सूखे विटप की सारिके !
*ऋचा=ऋग्वेद के मंत्र, जिसमें अग्नि, इन्द्र, वरुण, विष्णु की
स्तुति है; पीयूष=अमृत; नीहारिके=रात के समय आकाश में
दिखाई पड़नेवाले घने कोहरे की तरह के प्रकाश-पुंज
~ रामधारी सिंह 'दिनकर'
August 6, 2013
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